गीतासार

अध्याय ३ · श्लोक १५

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्।।३.१५।।

Transliteration

karma brahmodbhavaṁ viddhi brahmākṣhara-samudbhavam
tasmāt sarva-gataṁ brahma nityaṁ yajñe pratiṣhṭhitam

अर्थ

सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं। अन्न वर्षासे होती है। वर्षा यज्ञसे होती है। यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता है। कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षरब्रह्मसे प्रकट हुआ जान। इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्य-कर्म) में नित्य प्रतिष्ठित है।

Meaning

All actions originate from the Supreme Spirit, which is Imperishable, and in sacrificial actions, the all-pervasive Spirit is consciously present.